अटल जी की जयंती पर एक याद – नमन

संयुक्त राष्ट्र संघ के वार्षिक सम्मेलन को हिन्दी में सम्बोधित करने वाले पहले राजनेता थे अटल बिहारी वाजपेई जिनका आज जन्मदिवस है.

बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी वाजपेयी 1977 की जनता सरकार में विदेश मंत्री रहे. उन्होंने विदेश मंत्री के रूप में संयुक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी में भाषण दिया. संयुक्त राष्ट्र में वाजपेयी का यह भाषण उस वक्त काफी लोकप्रिय हुआ था. कहा जाता है कि वाजपेयी धाराप्रवाह अंग्रेजी बोलते थे, लेकिन संयुक्त राष्ट्र में अपने भाषण के लिये उस वक्त हिन्दी के चयन के पीछे उनका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय पटल पर हिन्दी को उभारना था.

1977 में संयुक्त राष्ट्र संध के मंच पर भारत की मूल भाषा की गूंज सारी दुनिया से सुनी थी. ‘वसुधैव कुटुंबकम’ का संदेश देते अपने भाषण में उन्होंने मूलभूत मानव अधिकारों के साथ- साथ रंगभेद जैसे गंभीर मुद्दों का जिक्र किया था. इतना ही नहीं भारत की इस गूंज को सुनने के बाद यूएन में आए सभी प्रतिनिधियों ने खड़े होकर वाजपेयी के लिए तालियां बजाई थीं.

संयुक्त राष्ट्र संघ में अटल जी की वो ऐतिहासिक भाषण –

मैं भारत की जनता की ओर से राष्ट्रसंघ के लिए शुभकामनाओं का संदेश लाया हूं. महासभा के इस 32 वें अधिवेशन के अवसर पर मैं राष्ट्रसंघ में भारत की दृढ़ आस्था को पुन: व्यक्त करना चाहता हूं. जनता सरकार को शासन की बागडोर संभाले केवल 6 मास हुए हैं फिर भी इतने अल्प समय में हमारी उपलब्धियां उल्लेखनीय हैं. भारत में मूलभूत मानव अधिकार पुन: प्रतिष्ठित हो गए हैं जिस भय और आतंक के वातावरण ने हमारे लोगों को घेर लिया था वह अब दूर हो गया है ऐसे संवैधानिक कदम उठाए जा रहे हैं जिनसे ये सुनिश्चित हो जाए कि लोकतंत्र और बुनियादी आजादी का अब फिर कभी हनन नहीं होगा. अध्यक्ष महोदय वसुधैव कुटुंबकम की परिकल्पना बहुत पुरानी है भारत में सदा से हमारा इस धारणा में विश्वास रहा है कि सारा संसार एक परिवार है अनेकानेक प्रयत्नों और कष्टों के बाद संयुक्त राष्ट्र के रूप में इस स्वप्न के साकार होने की संभावना है यहां मैं राष्ट्रों की सत्ता और महत्ता के बारे में नहीं सोच रहा हूं.

आम आदमी की प्रतिष्ठा और प्रगति के लिए कहीं अधिक महत्व रखती है अंतत: हमारी सफलताएं और असफलताएं केवल एक ही मापदंड से नापी जानी चाहिए कि क्या हम पूरे मानव समाज वस्तुत: हर नर-नारी और बालक के लिए न्याय और गरिमा की आश्वसति देने में प्रयत्नशील हैं. अफ्रीका में चुनौती स्पष्ट हैं प्रश्न ये है कि किसी जनता को स्वतंत्रता और सम्मान के साथ रहने का अनपरणीय अधिकार है या रंग भेद में विश्वास रखने वाला अल्पमत किसी विशाल बहुमत पर हमेशा अन्याय और दमन करता रहेगा.

अध्यक्ष महोदय भारत सब देशों से मैत्री चाहता है और किसी पर प्रभुत्व स्थापित करना नहीं चाहता भारत ना तो आण्विक शस्त्र शक्ति है और न बनना ही चाहता है. नई सरकार ने अपने असंदिग्ध शब्दों में इस बात की पुनघोर्षणा की है हमारी कार्यसूची का एक सर्वस्पर्थी विषय जो आगामी अनेक वर्षों और दशकों में बना रहेगा वह है मानव का भविष्य. मैं भारत की ओर से इस महासभा को आश्वासन देना चाहता हूं कि हम एक विश्व के आदर्शों की प्राप्ति और मानव कल्याण तथा उसके गौरव के लिए त्याग और बलिदान की बेला में कभी पीछे नहीं रहेंगे. जय जगत धन्यवाद।

कोटिशः नमन

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