72वें हिंदीं दिवस पर भी पूर्ण राज व राष्ट्रीय भाषा के इंतजार में “हिंदी”

साधना सिंह स्वप्निल (केंद्रीय कार्यालय) 14 सितंबर1949 संविधान सभा में सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया, हिंदी भारत की राष्ट्रभाषा होंगी, देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने कहा, इस दिन के महत्व को देखते हुए, हर साल 14 सितंबर को हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है।

यह भारतीयों के लिए गर्व का क्षण था ज़ब भारत की संविधान सभा ने हिंदी को आधिकारिक राजभाषा के रूप में अपनाया था।14 सितंबर जिस दिन भारत की संविधान सभा ने हिंदी को अपनी आधिकारिक भाषा के रूप में अपनाया, उस दिन से हर साल 14 सितंबर को हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है बहुत से स्कूल,कॉलेजो और कार्यालय में यह दिन बहुत उत्साह के साथ मनाया जाता है।

स्कूलों में वाद विवाद प्रतियोगिता हिंदी कविताएं और साहित्यिक कार्यक्रमों के साथ, कहानी प्रतियोगिताओं के साथ मनाया जाता हैं।

14 तारीख की एक ऐसी तारीख है जिस दिन हमेशा अंग्रेजी बोलने वाले ज्यादातर भारतीय हिंदी को याद कर लेते हैं यह अलग बात हैं दुनिया की प्रमुख भाषाओं में से एक हिंदी, अपने ही देश में अपने अस्तित्व के लिए लड़ रही हैं।

संविधान के साथ 14 भाषाओं संग स्वीकारी गई हिंदी

26 जनवरी, 1950 को जब हमारा संविधान लागू हुआ था, तब देवनागरी लिपि में लिखी गई हिंदी सहित 14 भाषाओं को आधिकारिक भाषाओं के रूप में आठवीं सूची में रखा गया था। संविधान के अनुसार 26 जनवरी 1965 को अंग्रेजी की जगह हिंदी को पूरी तरह से देश की राज भाषा बनानी थी और उसके बाद विभिन्न राज्यों और केंद्र को आपस में हिंदी में ही संवाद करना था। इसे आसान बनाने के लिए, संविधान ने 1955 और 1960 में राजभाषा आयोगों के गठन का भी आह्वान किया। इन आयोगों को हिंदी के विकास पर रिपोर्ट देनी थी और इन रिपोर्टों के आधार पर संसद की संयुक्त समिति द्वारा राष्ट्रपति को इस संबंध में कुछ सिफारिशें करनी थीं।

हिंदी विरोधियों का बवाल

लेकिन फिर शुरू हुआ बवाल और 1963 में हो गया बदलाव
लेकिन दक्षिण भारत के राज्यों में रहने वाले लोगों को डर था कि हिंदी के आने से वे उत्तर भारतीयों की तुलना में विभिन्न क्षेत्रों में कमजोर स्थिति में होंगे। हिंदी विरोधी आंदोलन के बीच वर्ष 1963 में राजभाषा अधिनियम पारित किया गया था, जिसने 1965 के बाद अंग्रेजी को आधिकारिक भाषा के रूप में प्रचलन से बाहर करने का फैसला पलट दिया था। हालांकि, हिंदी का विरोध करने वाले इससे पूरी तरह संतुष्ट नहीं थे और उन्हें लगा कि पंडित जवाहरलाल नेहरू या उनके बाद इस कानून में मौजूद कुछ अस्पष्टताएं फिर से उनके खिलाफ जा सकती हैं।

राजनैतिक आंदोलन।

हिंसात्मक आंदोलन के कारण 1967 में अंग्रेजी पुन: लौटी
26 जनवरी, 1965 को, हिंदी देश की आधिकारिक राज भाषा बन गई और इसके साथ-साथ दक्षिण भारत के राज्यों, विशेष रूप से तमिलनाडु (तब मद्रास) में राजनीति से प्रेरित आंदोलन और हिंसा का एक जबरदस्त दौर चला। राजनीतिज्ञों ने आंदोलन की आग को इस कदर भड़का दिया कि कई छात्रों ने आत्मदाह तक करली। इसके बाद तत्कालीन लाल बहादुर शास्त्री की कैबिनेट में सूचना एवं प्रसारण मंत्री रहीं इंदिरा गांधी के प्रयासों से इस समस्या का समाधान निकला, जिसके परिणामस्वरूप 1967 में राजभाषा अधिनियम में संशोधन किया गया कि जब तक गैर-हिंदी भाषी राज्य चाहे, तब तक अंग्रेजी को देश की आधिकारिक भाषा के रूप में आवश्यक माना जाए। इस संशोधन के माध्यम से आज तक यह व्यवस्था जारी है।

हिंदी पर हावी हुई अंग्रेजी, हिंदी 14 सितंबर तक सीमित
तब से तो कागजी तौर पर तो हिंदी राजभाषा बनी रही, लेकिन फली-फूली और समृद्ध होती गई अंग्रेजी भाषा। धीरे-धीरे देश की सरकारी मशीनरी ने हिंदी पर अंग्रेजी को तरजीह देते हुए उसी का चोला ओढ़ लिया। इसके बाद, अंग्रेजी भाषा की सरकारी व्यवस्था आधिकारिक तौर पर पकड़ और मजबूत होती गई और पूरे सिस्टम पर हावी हो गई। जब 14 सितंबर, 1949 को हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया गया और इससे संबंधित महत्वपूर्ण प्रावधान संविधान के भाग-17 में किए गए। इसी ऐतिहासिक महत्व के कारण राष्ट्रभाषा प्रचार समिति द्वारा प्रत्येक वर्ष 14 सितंबर को 1953 से ‘हिंदी दिवस’ का आयोजन किया जाता है। इस दिन हिंदी के प्रचार-प्रसार को बढ़ावा देने के लिए आयोजन किए जाते हैं।

यह हमारा दुर्भाग्य ही है हमारे देश में आज भी हिंदी को वह आसान नहीं मिला जो मिलना चाहिए, बहुत से कॉलेजों में, कार्यालयों में, स्कूलों में, आज भी अंग्रेजी में ही कार्य होते हैं अंग्रेजी का ही बोलबाला है उसमें अपना सम्मान समझते हैं हिंदी बोलने पर हम शर्मिंदा होते हैं। हम हिंदी दिवस को बड़े चाव से मनाते हैं कुछ लोगों को तो यह भी नहीं पता होगा हिंदी दिवस है क्या,?

अब 2014 से केंद्र की सत्ता में भाजपा राज कर रही है। देश की जनता देश में हुई कई दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं को सुधारने के लिए भाजपा की तरफ ही देख रही है। लेकिन केंद्र में शासित भाजपा भी 72 साल से इंतजार कर रही हिंदी भाषा को अभीतक राष्ट्र भाषा नही घोषित कर पाई और ना ही हिंदी को उसका बनता हक़ दे सकी।

लेखिका साधना सिंह -गोरखपुर

 

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