नेतृत्व में कमी बनी पंजाब भाजपा के लिए बड़ी चुनौती !

मोगा (साहिल गुप्ता) पंजाब में विधानसभा चुनाव की घोषणा हो चुकी है और राज्य में सत्ता के लिए हर राजनीतिक दल मैदान में है। इस दौड़ में राष्ट्रीय स्तर के राजनीतिक दल से लेकर राज्य स्तर के राजनीतिक दल सक्रिय हैं। सभी पार्टियां अपनी-अपनी रणनीति पर काम कर रही हैं, इन सबके बीच पंजाब में बीजेपी को दोगुनी मेहनत करनी पड़ रही है। भाजपा में इस समय सबसे बड़ी समस्या नेतृत्व की कमी है। पार्टी के पास कोई बड़ा नेता नहीं है जो पार्टी को ताकत दे सके। पार्टी कई सालों से पंजाब में सक्रिय है। पार्टी पंजाब में कभी 2 सीटों तो कभी 19 सीटों के साथ खुश रही है, लेकिन अकाली दल के साथ चलते गठबंधन में अपने कार्यकर्ताओं का हौंसला कभी बड़ा ही नही पाई। 2014 में केंद्र में सत्ता हासिल करने के बाद भी पंजाब भाजपा ने नेतृत्व और कार्यकर्ता की तरफ ध्यान न देकर सिर्फ केंद्र में सत्ता का राग अलापने का ही काम किया। फिर 2019 में पुनः केंद्र में भाजपा की सत्ता आने के बाद भी पार्टी अपना नेतृत्व नहीं बना पाई है। जिसका खामियाजा अभी भी भुगतना पड़ रहा है।

केंद्रीय सत्ता के सुख में आनन्दित रही

केंद्र में बीजेपी सत्ता में है और लगातार खुद को आगे बढ़ा रही है। केंद्र में आने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में उन्होंने कई राज्यों में सत्ता कब्जाने की कूटनीति चली। उन जगहों पर जहां कभी किसी ने बीजेपी का झंडा नहीं देखा, उसने सीटें जीती हैं, लेकिन दूसरी तरफ पंजाब है जहां अपने नेताओं की सोच और समझ अपने प्रिय नेता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अलग है। यहां पार्टी सत्ता में रही लेकिन खुद को मजबूत नहीं कर पाई। 19 विधायकों के साथ, पार्टी ने अकाली दल के साथ सत्ता का आनंद लिया, लेकिन संगठन को कोई मूल्य नहीं दिया। पार्टी में नए लोग या यूं कहें कि दूसरी लाइन नहीं बनने दी गई, जो आज पंजाब में पार्टी के लिए नुकसान है। पार्टी को पंजाब में 117 सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए उम्मीदवार नहीं मिल रहे हैं। पार्टी की जनता अब तक केवल अकाली दल पर निर्भर रही है, जिसने अपने ही लोगों को आगे आने से रोका है।

घूम फिर के सब वहीँ के वहीं

पंजाब में बीजेपी के भीतर इतना तनाव है कि उसके नेता भी इसका हल नहीं ढूंढ पा रहे हैं। पार्टी में दूसरे दर्जे का कोई नेता नहीं है जो कार्यकर्ताओं को सही दिशा दे सके। इसलिए 20 साल पहले अपनी बारी का इंतजार कर रहे बीजेपी कार्यकर्ता आज भी इंतजार कर रहे हैं। पार्टी ने 2010 में पंजाब की बागडोर अश्विनी शर्मा को सौंपी थी, जिसके बाद 2012 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने 12 सीटों पर जीत हासिल की थी। शर्मा को तब प्रदेश अध्यक्ष पद से हटा दिया गया था। अब कुछ साल बाद अश्विनी शर्मा फिर से अध्यक्ष हैं, जबकि पार्टी को कोई और चेहरा नहीं मिल रहा है। इसी तरह सुभाष शर्मा भी पहले कमल शर्मा के साथ महासचिव रहे फिर अश्वनी शर्मा के साथ इसी पद हैं। पूर्व महासचिव को एक और पद दिया गया है। कुल मिलाकर वही चुनिंदा चंद लोग पार्टी में अलग-अलग भूमिका निभा रहे हैं और पंजाब में बार-बार वही नीतियां लागू की जा रही हैं, जिससे पंजाब में पार्टी की हालत खराब होती जा रही है।

मीडिया में ‘हाई जोश’

अगर किसी आम बीजेपी कार्यकर्ता से कभी पूछा जाए कि ‘उत्साह कैसा है’ तो इसका एक ही जवाब होता है ‘हाई’ लेकिन पार्टी के पंजाब नेतृत्व का पूरा उत्साह केवल मीडिया में ही है। चुनिंदा पत्रकारों के साथ बैठकों के माध्यम से समाचारों को मीडिया के सामने लाया जाता है, लेकिन जमीनी स्तर पर पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच संवाद कम होता है। यही खबर केंद्र के कुछ नेताओं को यह बताने की कोशिश में भेजी जा रही है कि पंजाब में बीजेपी की स्थिति ‘अच्छी’ है, जबकि पंजाब के कार्यकर्ता पार्टी से दूर जा रहे हैं, क्योंकि बीजेपी सड़कों पर कहीं नजर नहीं आ रही है। चूंकि कांग्रेस पंजाब में सत्ता में थी, इसलिए वह पंजाब के लोगों के मुद्दों को भुना सकती थी और राज्य में एक प्रमुख स्थान हासिल कर सकती थी।

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