महिला शशक्तिकरण धरातल पर लाना होगा

आज हमें महिला सशक्तिकरण , सम्मान को केवल मंचो पर नही अपितु आदर्शों के धरातल पर यह गढ़ना होगा तभी एक स्वस्थ समाज का निर्माण होगा — – —–

देश में महिला सशक्तिकरण को लेकर जारी चर्चाओं के बीच आज भी महिलाओं की परेशानियों और उसका उचित समाधान ढूंढने की दिशा में कोई ठोस नतीजा हासिल नहीं किया जा सका हैं।ऐसे में यदि महिला आयोग की किसी सदस्य के द्वारा बयान बेटियों को मोबाइल न देना ,निगरानी करना या मोबाइल चलाने से भाग जाना जैसे बयान पर हंगामा मचाना स्वाभाविक हो गया।मेरे पास भी अनजाने में लगभग 100 लोगो का फोन आता है कि मेडम ये आपने क्या कह दिया? स्वाभाविक भी है जब महिला आयोग की किसी मेरे नाम की सदस्य द्वारा बयान आता है तो पूछना बनता है लोगो का ।मैंने उन सदस्य के बयान की वीडियो देखी जिसमे माँ द्वारा लापरवाही को इंगित किया गया कि बेटियों का बिशेष ध्यान दें ।यह सच भी है मुझे कहते हुए जरा भी गुरेज नही है कि मेरे महिला आयोग में रहने के दौरान जितनी समस्याएं आती थी उनमें 20 फीसदी मामले नाबालिग लड़कियो की अपरिपक्व मित्रता के कारण की तह में जाने के कारण एक मोबाइल भी है जिसे माताओं द्वारा सम्भाल न करना भी बाहर की मित्रता फिर घर से गायब व अन्यान्य विभत्स घटनाओं का होना ।मैं मानती हूं कि महिला अपराधों में केवल एक यह कारण नही पर एक कारण यह भी है। बालमन द्वारा हुए इसतरह की घटना उसे जीवनभर एक अंधेरे खाई की तरफ धकेल देता है और ऐसे गम्भीर विषय को लेकर देशभर में डिबेट के हंगामे से आत्म मंथन छूटता जा रहा है ।निश्चित नारियों को संविधान प्रदत्त अधिकार है पर आज भी महिलायें उतनी सुरक्षित और सम्मानित नहीं दिखतीं, जितने अधिकार और अवसर उन्हें संविधान द्वारा मिले हुए है ।देश में महिला सशक्तिकरण को लेकर जारी आम चर्चाओं के बीच आज भी महिलाओं की परेशानियों और उसका उचित समाधान ढूंढने की दिशा में कोई ठोस नतीजा हासिल नहीं किया जा सका हैं।आज भी महिलायें उतनी सुरक्षित और सम्मानित नहीं दिखतीं, जितने अधिकार और अवसर उन्हें संविधान प्रदत हैं। वह पीड़ित, प्रताड़ित, भयभीत है और अपने अस्तित्व को लेकर आशंकित भी। आज भी महिलाओं को समाज में कई समस्याओं का सामना पड़ रहा हैं।अतीत में हमारे देश में स्त्री का मान-सम्मान बहुत था। जबकि अन्य देशों में यहां तक माना गया कि स्त्री को केवल इसलिए बनाया गया है कि वह पुरुष का वंश चला सके। कमोबेश उन्नीसवी शताब्दी तक यही मान्यता रही। मगर हमारे देश में ऐसी किसी मान्यता में विश्वास नहीं था। यूरोप में स्त्रियों की दयनीय हालत का इससे भी पता चलता है कि इंग्लैण्ड में उन्हें वोट का अधिकार 1918 में, फ्रांस में 1945 में और अमेरिका में तो यह अधिकार 1920 में मिला।हमारे देश की स्थिति स्त्री को लेकर एकदम उलट रही। भारतीय मानस का अतीत सिद्धांत, स्वीकार्यता और मान्यता तीनों दृष्टि से स्त्री को श्रेष्ठ और सम्माननीय स्थान देता आया है। यहां स्त्रियों को अपने अधिकारों को प्राप्त करने के लिए किसी संघर्ष आंदोलन की जरूरत ही नहीं पड़ी। दरअसल जो समस्या रही है, वह व्यवहार की है। हमारे यहां नारी शक्तिकरण के जितने आंदोलन चले, वे मानसिकता को बदलने और व्यवहार में आई जड़ता को तोड़ने के लिए ही चलाए गए। सैद्धांतिक तौर पर तो हमारे यहां स्त्री-अधिकार निर्विवाद रहा है। जिन दिनों इंग्लैंड में स्त्री को अधिकार देने और न देने की बहस चल रही थी, तब 1916 में एनीबेसेन्ट कांग्रेस की सभापति बन चुकी थी और 1925 में दूसरी महिला सरोजनी नायडू ने इस पद को सुशोभित किया जबकि वह समय परतंत्रता का था और स्वतंत्रता के बाद तो पहले ही दिन से संविधान में स्त्रियों को बराबरी का न केवल सर्वत्र अधिकार है अपितु कहीं-कहीं तो विशिष्ट अधिकार भी है।पर क्या हम उस विशिष्ट अधिकार को यूं ही धता बता देने की मनसा में जी रहे है या आगे सुनियोजित आत्मविश्वास से लबरेज नारी शक्ति स्वयं को स्वयं सिद्धा बनाने को तेज कदमो से उन्मुख होंगी ।आज हमें महिला सशक्तिकरण के दिखावे की बजाय उन्हें अपराधमुक्त जीवन यानी सुरक्षित रहने के अवसर देने और संत्रास से उबारकर ऊपर लाने की चिंता करने की आवश्यकता है। यह चिंता इस नजरिये से भी जरूरी है कि आधी आबादी को अशिक्षित, असम्मानित और उपेक्षित छोड़ कर उन्नति की कल्पना भी नहीं की जा सकती।समाज मे घटित हो रहे अपराध को हम देखते है तो पाते है कि समाज में कहीं भी, किसी भी किस्म के घटने वाले अपराध से प्रत्यक्ष या परोक्ष भाव में महिला ही पीड़ित होती है। हमारे देश में महिलाओं को लेकर दो तस्वीरें हैं, एक अतीत और दूसरी आज की। समाज ने उनके असम्मान को कभी बर्दाश्त भी नहीं किया, क्योंकि हमारा समाज लंबे समय तक मातृसत्तात्मक रहा है और बच्चों की पहचान अपनी माताओं के नाम से होती रही है। रेणुकानंदन, देवकीनंदन, कौन्तेय, सौमित्र और गौरीनंदन का संबोधन इस समृद्ध परंपरा का ही प्रतीक है।वास्तव में हमारे अतीत की स्त्री गौरवगाथा अनंत है, उसके भावों की प्रतिष्ठा अनूठी और अद्वितीय है, मगर आज स्थिति बदल गई है। आज स्त्री की क्षमता, मेघा, प्रज्ञा, ज्ञान का आकलन कम अपितु उसके देहपिंड का आकर्षण अधिक हो गया है। स्थिति यह है कि वह घर, बाजार या कार्यस्थल सभी स्थानों पर मानसिक व शारीरिक हिंसा और प्रताड़ना झेलने को मजबूर है।सवाल है कि जिस देश की स्त्री का स्थान इतना ऊंचा था, श्रेष्ठ था, वहां उनकी इतनी दुर्दशा क्यों हुई।, आज सभी मंचो से महिला सशक्तिकरण की बात करते हैं, उसकी भागीदारी की चिंता करते हैं तो इस मानसिकता और व्यवहार पर भी विचार करना होगा। यह विचार किसी को दोषी ठहराने के लिए नहीं बल्कि भविष्य में सावधानी बरतने के लिए आवश्यक है।आधुनिक युग की महिलाएं समाज से अपने लिए देवी का संबोधन नहीं मांगती हैं। स्त्रियों को देवी समझा जाए या नहीं लेकिन कम से कम उन्हें मानव की श्रेणी से नीचे न गिराया जाए। हजारों साल पहले महिलाओं की स्थिति पुरुषों से कहीं कमतर नहीं थी। लेकिन कुछ ऐतिहासिक कारणों से वे नीचे धंसती चली गईं। आज यह पूरे समाज का दायित्व है कि वह नारी को बराबरी का स्थान दें।नारी और पुरुष एक दूसरे के शत्रु नहीं हैं बल्कि पूरक हैं। कहा भी गया है शिव शक्ति के बिना शव के समान हैं। राधा के बिना कृष्ण आधा हैं। नारियों की समस्या केवल उनकी समस्या नहीं है।
आज हमें महिला सशक्तिकरण , सम्मान को केवल मंचो पर नही अपितु आदर्शों के धरातल पर यह गढ़ना होगा तभी एक स्वस्थ समाज का निर्माण होगा।।
यह पूरे समाज की समस्या है। या यूं कहिए सामाजिक समस्या का एक अंग है। साफ है कि नारी की स्थिति में बदलाव लाने के लिए पूरे सामाजिक ढांचे एवं सोच में बदलाव लाना जरूरी है । यहां यह कहना समीचीन होगा कि वर्तमान की केंद्र की मोदी सरकार द्वारा नारी सशक्तिकरण के लिए निरंतर विभिन्न योजनाओं के मध्यान से सशक्त प्रयास किये जा रहे है और नारियां सशक्त हो भी रही है ,लेकिन समाज को भी अपने विचार परिवर्तन के साथ आगे आना होगा तभी महिला अपराधों से मुक्ति मिलेगी और महिला सशक्तिकरण को समाज द्वारा बल मिलेगा। Narendra Modi J.P.Nadda MYogiAdityanath Sunil Bansal Swatantra Dev Singh BJP Uttar Pradesh Bharatiya Janata Party (BJP)

मीना चौबे
प्रदेश मंत्री भाजपा उत्तर प्रदेश
सम्पादक नारी जागरण पत्रिका

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